Tuesday, 25 September 2012

ये ज्योतिषीय योग बनाते हें आपको डॉक्टर/चिकित्सक/DOCTOR -----
                                 
 
जन्म पत्रिका में अनेक प्रकार के योगों का निर्माण ग्रहों की स्थिति अनुसार होता है। ग्रहों से बनने वाले योगों में से कुछ योग ऎसे होते हैं, जो व्यक्ति के चिकित्सक बनने में सहायक होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
कुंडली में आत्मकारक ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि में स्थित होकर लग्न में हों और उनकी युति पंचमेश से होने पर व्यक्ति को चिकित्सक बनाने में सहायक है।
मेष, सिंह, धनु या वृश्चिक राशि का संबंध दशम भाव से होने पर व्यक्ति चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।
राहू-केतु बली व शुभ स्थान पर होने से व्यक्ति चिकित्सक बनता है।
दशम भाव या दशमेश से मंगल अथवा केतु का दृष्टि-युति संबंध होने पर शल्य चिकित्सक व्यक्ति बन सकता है।
एकादश भाव आय का, पंचम भाव संतान, विद्या, मनोरंजन का भाव है। इस एकादश भाव से पंचम भाव पर सूर्य, चंद्र, शुक्र की सप्तम पूर्ण दृष्टि पड़ती है। वहीं मंगल की दशम भाव से अष्टम एकादश भाव से सप्तम व धन, कुटुंब भाव से चतुर्थ दृष्टि पूर्ण पती है। गुरु धर्म, भाग्य भाव नवम से पंचम भाव पर नवम दृष्टि डालता है तो एकादश भाव से सप्तम लग्न से पंचम दृष्टि पूर्ण पती है। शनि की तृतीय दृष्टि तृतीय भाई, पराक्रम भाव से एकादाश भाव से सप्तम व अष्टम भाव से दशम पूर्ण दृष्टि पड़ती है। यहाँ पर हमारे अनुभव अनुसार राहु-केतु जो छाया ग्रह हैं, उनके बारे में विशेष फल नहीं मिलता न ही इनकी दृष्टि को माना जाता है न ही किसी एकादश भाव पर रहने से पंचम भाव पर कोई असर आता है।



#एकादश भाव आय का, पंचम भाव संतान, विद्या, मनोरंजन का भाव है। इस एकादश भाव से पंचम भाव पर सूर्य, चंद्र, शुक्र की सप्तम पूर्ण दृष्टि पती है। वहीं मंगल की दशम भाव से अष्टम एकादश भाव से सप्तम व धन, कुटुंब भाव से चतुर्थ दृष्टि पूर्ण पती है। गुरु धर्म, भाग्य भाव नवम से पंचम भाव पर नवम दृष्टि डालता है तो एकादश भाव से सप्तम लग्न से पंचम दृष्टि पूर्ण पती है। शनि की तृतीय दृष्टि तृतीय भाई, पराक्रम भाव से एकादाश भाव से 


#सप्तम व अष्टम भाव से दशम पूर्ण दृष्टि पती है। यहाँ पर हमारे अनुभव अनुसार राहू-केतु जो छाया ग्रह है उनके बारे में विशेष फल नहीं मिलता न ही इनकी दृष्टि को माना जाता है न ही किसी एकादश भाव पर रहने से पंचम भाव पर कोई असर आता है। 


#सर्वप्रथम सूर्य को लें यहां से यदि पंचम भाव पर सिंह राशि अपनी स्वदृष्टि से देखता है तो भले ही आय में कमी हो, लेकिन विद्या व संतान उत्तम होती है, संतान के बहोने पर लाभ मिलता है। एकादश भाव में कोई ग्रह हो, नीच को छोसभी शुभफल प्राप्त होते हैं। सूर्य की तुला राशि पर दृष्टि संतान व विद्या में कष्टकारी होती है। अतः ऐसे जातकों को सूर्य की आराधना व सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान अपने शरीर से सात या नौ बार उतार कर रविवार को करना चाहिए। इस प्रकार अनिष्ट प्रभाव से बचा जा सकता है। जिन ग्रहों की नीच दृष्टि पउससे संबंधित दान करें। 

#चंद्रमा की स्वदृष्टि पंचम भाव पर पतो जातक शांति नीति वाला, ज्ञानी, सच्चरित्र, गुणी, मान-सम्मान पाने वाला होता है उसे भूमि में गधन मिलता है। ऐसा जातक मिलनसार होता है। अशुभ वृश्चिक राशि को देखता हो तो चंद्र की वस्तु दान करना ही श्रेष्ठ रहेगा। मंगल की शत्रु नीच दृष्टि यदि पंचम भाव पर पती हो तो संतान से कष्ट, विद्या में कमी रहती है। यदि मित्र स्वदृष्टि हो तो संतान आदि में उत्तम लाभ रहता है। 

#यदि मंगल दशम भाव से स्वदृष्टि वृश्चिक राशि को देखता हो तो वह जातक चिकित्सा क्षेत्र में होता है और सर्जन बनता है। ऐसा जातक यदि फौजदारी में रहे व वकालात करे तो भी लाभ पाता है। मंगल की चतुर्थ दृष्टि पंचम भाव पर उच्च, स्व मित्र दृष्टि के रुप में पतो वह विद्या के क्षेत्र में उत्तम लाभ पाता है। वहीं उसकी संतान भी स्वस्थ, उत्तम, धनी होती है। धन कुटुंब से भी उत्तम लाभ पाता है। मंगल की नीच शत्रु दृष्टि पसे धन, कुटुंब से हानि, विद्या में मन न लगना आदि होता है। बुध की उच्च स्वदृष्टि संतान, विद्या में उत्तम लाभकारी होती है। मित्र दृष्टि हो तो जातक को सभी सुख मिलते हैं। ऐसा जातक चित्रकला, शिल्पकला, लेखक, पत्रकार आदि होता है। व्यापार-व्यवसाय में भी सफल होता है। 

#गुरु यदि पंचम दृष्टि से देखता हो तो वह जातक ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ, आज्ञाकारी होता है। न्यायाधीश, उच्च प्रशासनिक अधिकारी भी हो सकता है। वृषभ का गुरु होकर पंचम भाव को देखता हो तो ऐसा जातक कामातुर होता है। नवम भाव से गुरु पंचम भाव पर दृष्टि स्व, उच्च, मित्र रखता हो तो ऐसा जातक विद्वान, ज्ञानी, संतों का सेवक, धर्म-कर्म में पूर्ण आस्थावान होता है तथा उसकी संतान भाग्यशाली होती है। गुरु की एकादश भाव से पूर्ण दृष्टि पती है तो ऐसा योग संतान में बाधक भी बन जाता है व देर से संतान होती है। शत्रु या नीच दृष्टि पती हो तो उसकी स्त्री बांझ भी हो सकती है। संतान अधर्मी, कष्टकारी होती है, लेकिन ऐसा जातक धन से सुखी होता है। 

#शुक्र की एकादश भाव से स्वदृष्टि विद्या, मनोरंजन के क्षेत्र से, इलेक्ट्रॉनिक, व्यापार से, इंजीनियर में सफलता पाता है। मनोविनोदी कन्या संतति अधिक होती है। ऐसे जातकों के अनेक स्त्रियों से संबंध होते है। मित्रों से लाभ पाने वाला, खर्चीला भी होता है। 

#शनि की पंचम भाव पर तृतीय भाव से तृतीय स्व, उच्च दृष्टि, मित्र दृष्टि विद्या में, संतान आदि में थोविलंब से लाभ दिलाती है व जातक संतान से दुःखी रहता है। शनि की एकादश भाव से पूर्ण दृष्टि स्व, मित्र पसे राज्यपक्ष से लाभ पाने वाला, वाहनादि से पूर्ण, उत्तम धन पाने वाला रहता है। शनि की दशम दृष्टि अष्टम भाव से पत्नी से सुखी रखती है वहीं संतान भी आज्ञाकारी होती है, लेकिन शत्रु नीच दृष्टि पतो संतान आदि से कष्ट मिलता है। 

@उपरोक्त ग्रह स्थिति में किसी भी ग्रह कीअशुभ दृष्टि पंचम भाव पर पती हो तो उन ग्रहों से संबंधित दान की वस्तुएँ उसी दिन को अपने शरीर से 9 बार उतारकर उसी रंग के कपमें बांधकर जमीन में गादेने से अशुभ प्रभाव में न्यूनता आ जाती है।
चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता पाने की चाह रखने वालों के शनि और राहु सहायक ग्रह होते हैं। शनि चिकित्सा के क्षेत्र में प्रवेश करवाता है। शनि लौह तत्व का कारक है तथा डॉक्टरों का अधिकतम कार्य लोहे से बने औजारों और मशीनों से ही होता है। शनि में साथ यदि राहु की भी सही स्थिति कुंडली में बन जाए तो व्यक्ति डॉक्टर होने के साथ-साथ शल्य चिकित्सक या विशेषज्ञ होता है।

###चिकित्सा शिक्षा में बेहतर परिणाम कैसेयदि जातक की कुंडली में शनि कर्म, पराक्रम सप्तम आय स्थान में स्थित हो तो विद्यार्थी का रुझान फिजिक्स, कैमेस्ट्री, बॉयोलॉजी की तरफ होता है। यदि इन्हीं घरों में शनि उच्च का स्वग्रही या मित्र राशि में हो तो डॉक्टरी पेशे में उसको विशेष दक्षता प्राप्त होती है। शनि कमजोर हो तो थोड़ी सी अधिक मेहनत कर बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
 

सूर्य का प्रभाव—-
सर्वप्रथम सूर्य को लें यहाँ से यदि पंचम भाव पर सिंह राशि अपनी स्वदृष्टि से देखता है तो भले ही आय में कमी हो, लेकिन विद्या व संतान उत्तम होती है, संतान के बहोने पर लाभ मिलता है। एकादश भाव में कोई ग्रह हो, नीच को छोसभी शुभफल प्राप्त होते हैं। सूर्य की तुला राशि पर दृष्टि संतान व विद्या में कष्टकारी होती है। अतः ऐसे जातकों को सूर्य की आराधना व सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान अपने शरीर से सात या नौ बार उतारकर रविवार को करना चाहिए। इस प्रकार अनिष्ट प्रभाव से बचा जा सकता है। जिन ग्रहों की नीच दृष्टि पड़े, उससे संबंधित दान करें।

चंद्रमा का प्रभाव—-
चंद्रमा की स्वदृष्टि पंचम भाव पर पड़े तो जातक शांति नीति वाला, ज्ञानी, सद्‍चरित्र, गुणी, मान-सम्मान पाने वाला होता है उसे भूमि में गड़ा धन मिलता है। ऐसा जातक मिलनसार होता है। अशुभ वृश्चिक राशि को देखता हो तो चंद्र की वस्तु दान करना ही श्रेष्ठ रहेगा। मंगल की शत्रु नीच दृष्टि यदि पंचम भाव पर पती हो तो संतान से कष्ट, विद्या में कमी रहती है। यदि मित्र स्वदृष्टि हो तो संतान आदि में उत्तम लाभ रहता है।
लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम भाव में सूर्य, चंद्रमा अथवा गुरू के साथ मंगल की युति जातक को डॉक्टर बनाने में सहायक है।
यदि लग्न में मंगल स्वराशि अथवा उच्च राशि का हो, सूर्य पंचम भाव से संबंध बनाए, तो ऎसे योग वाला सर्जरी में निपुण होता है।
कुंडली में सूर्य, मंगल और गुरू सहित केतु भी बली होकर लग्न, पंचम और दशम भाव से संबंध बनाए, तो जातक चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता पाता है।
यदि जन्मकुंडली में कर्क राशि और मंगल दोनों बलवान हों तथा लग्न एवं दशम भाव से मंगल और राहू का संबंध किसी भी रूप में हो, तो जातक चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। ऊपर बताए गए सामान्य योग हैं। पूर्ण जानकारी के लिए ज्योतिषी को कुंडली दिखाएं…
शनि-राहु बनाएंगे डॉक्टर !

चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता पाने की चाह रखने वालों के शनि और राहु सहायक ग्रह होते हैं। शनि चिकित्सा के क्षेत्र में प्रवेश करवाता है। शनि लौह तत्व का कारक है तथा डॉक्टरों का अधिकतम कार्य लोहे से बने औजारों और मशीनों से ही होता है। शनि में साथ यदि राहु की भी सही स्थिति कुंडली में बन जाए तो व्यक्ति डॉक्टर होने के साथ-साथ शल्य चिकित्सक या विशेषज्ञ होता है।

Saturday, 15 September 2012


सरल anubhati सिद्ध तांत्रिक prayog- (saral anubhati sidh tantric prayog)
दहजमी से मुक्ति हेतु : बदहजमी होने अथवा पेट में अफारा आने पर तुलसी के सात पत्ते रोगी को खिलाएं। ध्यान रहे, इन पत्तों को चबाएं नहीं।
नेत्र पीड़ा से रक्षा के लिए : आंखों की बीमारी में मुक्ति हेतु सूर्य की उपासना करें। साथ ही सुबह उठकर सूर्यमुखी का फूल सूंघें तथा शुद्ध गुलाब जल आंखों में डालें। सूर्य नमन लाभकारी पाये गये हैं। अतः इस रोग में व्यक्ति को प्रातःकाल उठ कर सूर्यमुखी का फूल सूूंघना चाहिए तथा शुद्ध गुलाब जल आंखों में डालना चाहिए।
स्वास्थ्य को अनुकूल रखने के लिए : पारद शिव लिंग का दूध से अभिषेक कर पूजा उपासना करें। यह क्रिया श्रावण मास के प्रथम सोमवार से शुरू करें और नियमित रूप से करते रहें, असाध्य से असाय रोगों से मुक्ति मिलेगी।                            
                                                                                                          
सिर दर्द से मुक्ति हेतु : शनिवार एवं मंगलरवार को नियमित रूप से हनुमान जी के चरणों के सिंदूर का तिलक करें, सिर दर्द से मुक्ति मिलेगी।
पीलिया से बचाव के लिए : पीलिया एक खतरनाक बीमारी है। इससे मुक्ति और बचाव के लिए गुरुवार को सूर्योदय या सूर्यास्त के समय पुनर्नवा की जड़ गले में धारण करें।
जीवन में सफलता हेतु : लकड़ी की डिब्बी में पीला सिंदूर रखकर उसमें गोमती चक्र रखें, घर में धन का आगमन होगा और जीवन सफल होगा।
कार्य में सफलता के लिए : किसी उच्च अधिकारी से कार्य करवाना हो या कोर्ट कचहरी में कार्य हेतु जाना हो तो गुंजा की जड़ जेब में रखकर जाएं, सफलता मिलेगी।
वशीकरण के लिए : गुंजा को चंदन की भांति मस्तक पर लगाकर जाएं, दुश्मन भी आपको देखेगा तो वशीभूत हो जाएगा। भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति हेतु : ५ रत्ती गुंजा शरीर पर बांधें, भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति मिलेगी।
                                               
हृदय रोग से मुक्ति के लिए : हृदय रोग में सोमवार को पांचमुखी असली रुद्राक्ष काले डोरे में पहनें। सूर्य भगवान को प्रतिदिन जल चढ़ाएं तथा आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करें। जिन्हें दिल का दौरा पड़ चुका हो, वे सात साबुत लाल मिर्च और एक लाल हकीक लाल कपड़े के एक टुकड़े में बांध कर अपने ऊपर से इक्कीस बार वार कर बहते पानी में बहा दें, लाभ होगा।
परदेश गए व्यक्ति की वापसी हेतुः प्रातः स्नान करने के बाद परदेश गए व्यक्ति का नाम कागज पर लिखकर रख लें। फिर आटे का एक दीपक बनाकर उसमें सरसों का तेल डालकर उसे जलाएं। फिर जमीन पर नमक रखें और उस पर दीपक रखकर उस व्यक्ति का ध्यान कर ग्यारह बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। यह क्रिया 43 दिनों तक नियमित रूप से करें, व्यक्ति वापस आ जाएगा।
दिए गए धन की वापसी हेतु : ऊपर वर्णित विधि की तरह आटे का दीपक जलाएं तथा जिसे पैसे दिए हों, उस व्यक्ति का ध्यान कर ग्यारह बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। यह क्रिया 43 दिन तक लगातार नियमित रूप से करते रहें, दिए हुए पैसे वापस मिल जाएंगे।
एकाग्रता हेतु : नित्य मां के चरण स्पर्श करें और क्क सोम सोमाय नमः का जप करें।
परिश्रम के अनुरूप अंक प्राप्ति हेतु : किसी योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुरूप लग्नेश या पंचमेश का रत्न या उपरत्न धारण करें।
स्मरण शक्ति को सुदृढ़ करने हेतु : पन्ना धारण करें और क्क ऐं सरस्वत्यै नमः का जप करें।
अच्छे अंक की प्राप्ति हेतु : लग्न (लक्ष्य), सूर्य (मनोबल) और चंद्र (मन) अनुकूल हों, तो छात्र को अच्छे अंक प्राप्त होते हैं। आत्मविश्वास को मजबूत करने के लिए पिता के चरण स्पर्श करें और सूर्य को अर्य दें। पढ़ाई पर अधिक ध्यान दें, किंतु साथ ही थोड़ा समय खेल, परिवार और मित्रों के लिए भी निकालें। प्रसन्नचित्त रहें और शाकाहारी तथा पौष्टिक भोजन लें।
मन की चंचलता दूर करने हेतु : लौंग को अपने ऊपर से ७ बार उतार कर बाहरी सड़क पर फेंक दें, मन की चंचलता दूर और निर्णय क्षमता सुदृढ़ होगी।
शिक्षा संबंधी किसी भी कष्ट से मुक्ति हेतु : गणेश को प्रतिदिन ३ से ५ पत्तियों वाली दूर्वा चढ़ाएं और उनके द्वादश नामों का पाठ करें। इससे मन शांत तथा अनुकूल रहेगा और शिक्षा में आने वाली रुकावटें दूर होंगी।
सांप के विष से बचाव हेतु : चैत्र मास की मेष संक्राति के दिन मसूर की दाल एवं नीम की पत्तियां खाएं। सर्प काट भी लेगा तो विष नहीं चढ़ेगा। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन प्रातः काल नीम की पत्तियां चबाकर पानी पीएं और घूमने जाएं, शरीर में विष रोधी क्षमता बढ़ेगी।
घर में स्थिर लक्ष्मी के वास के लिए : चक्की पर गेहूं पिसवाने जाते समय तुलसी के ग्यारह पत्ते गेहूं में डाल दें। एक लाल थैली में केसर के २ पत्ते और थोड़े से गेहूं डालकर मंदिर में रखकर फिर इन्हें भी पिसवाने वाले गेंहू में मिला दें, धन में बरकत होगी और घर में स्थ्रि लक्ष्मी का वास होगा। आटा केवल सोमवार या शनिवार को पिसवाएं।
पति-पत्नी के बीच वैमनस्यता को दूर करने हेतु : रात को सोते समय पत्नी पति के तकिये में सिंदूर की एक पुड़िया और पति पत्नी के तकिये में कपूर की २ टिकियां रख दें। प्रातः होते ही सिंदूर की पुड़िया घर से बाहर फेंक दें तथा कपूर को निकाल कर उस कमरे जला दें।
पैतृक संपत्ति की प्राप्ति के लिए : घर में पूर्वजों के गड़े हुए धन की प्राप्ति हेतु किसी सोमवार को २१ श्वेत चितकवरी कौड़ियों को अच्छी तरह पीस लें और चूर्ण को उस स्थान पर रखें, जहां धन गड़े होने का अनुमान हो। धन गड़ा हुआ होगा, तो मिल जाएगा।
सगे संबंधियों को दिया गया धन वापस प्राप्त करने हेतु : किसी सगे संबंधी को धन दिया हो और वह वापस नहीं कर रहा हो, तो ऊपर बताई गई विधि की भांति २१ श्वेत चितकबरी कौड़ियों को पीस कर चूर्ण उसके दरबाजे के आगे बिखेर दें। यह क्रिया ४३ दिनों तक करते रहें, वह व्यक्ति आपका धन वापस कर देगा।
बुखार से मुक्ति हेतु : शनि या रविवार को चावल के सात दाने लेकर घर से बिना बोले किसी आक के पेड़+ के पास जाकर पूरब की ओर मुख खड़े हो जाएं और हे ज्वर, आपको शनिवार का निमंत्रण है कहते हुए चावल का एक दाना आक की जड़ में रख दें, बिना बुलाए मत आना, दूसरा चावल रखकर कहें कि ज्वर देव आपको सोमवार का निमंत्रण है, किंतु बिना नहीं आना। यह क्रिया सप्ताह के सभी दिनों का नाम लेकर करें, बुखार से मुक्ति मिल जाएगी।
आधासीसी के दर्द से मुक्ति हेतु : सूर्य निकलने से पूर्व घर से गुड़ की एक डली लेकर निकलें। किसी चौराहे पर आकर पश्चिम की ओर मुख करके खड़े हों तथा गुड़ की आधी डली को मुंह से कई टुकड़े करके वहीं फेंक दें और घर आ जाएं, सिर का दर्द समाप्त हो जाएगा।
नजर दोष से मुक्ति हेतु कुछ विशेष उपाय :
गाय के गोबर का चौमुखी दीप बनाकर उसमें तिल के तेल की बत्ती जला दें और थोड़ा गुड़ डाल दें। फिर उसे घर के मुख्य द्वार पर रख दें, बच्चे की नजर दोष से रक्षा होगी।
गेहूं के आटे से दीया बनाएं और उसमें काले धागे की बत्ती जलाएं। उस ज्योति में दो लाल मिर्च रखें और उसे नजर लगे व्यक्ति पर से उतारें, नजर दोष दूर होगा।
रविवार या शनिवार को नजर लगे व्यक्ति के सिर पर से तीन बार दूध फेरकर कुत्ते को दें, नजर दोष से मुक्ति मिलेगी।
ज्वार की रोटी एक तरफ से ही सेंकें। सेंके हुए भाग पर घी लगाकर रोटी को पीले धागे से बांधें। फिर उसे नजर लगे व्यक्ति के ऊपर से ७ बार उतारकर कुत्ते को दे दें, नजर दोष दूर होगा।
अठारा रोग से बचाव के लिए : किसी कन्या के हाथ का कता सूत लेकर उसका एक हाथ लंबा धागा बना लें तथा रविवार को अठारा रोग से ग्रस्त रोगी की दाहिनी पिंडली में बांध दें। रोगी ठीक हो जाएगा।
पुत्र प्राप्ति हेतु : रविपुष्य योग में शेर और बिल्ली का नाखून लेकर एक साथ मढ़ा कर दायें बाजू पर बांध लें, पुत्र की प्राप्ति होगी। 
                                                                                                              
कार्य में आने वाली रुकावटों से मुक्ति हेतु : शनिवार को एक पात्र में कच्ची घानी का सरसों तेल लेकर उसमें अपनी छाया देखें। फिर उसमें गुड़ के गुलगुले डालें और उसे किसी गरीब को दे दें, बाधाओं मुक्ति मिलेगी और शनि कोप से बचाव होगा।
कार्य में सफलता हेतु : किसी कार्य विशेष के लिए जाने से पहले एक बेदाग नीबू को गाय के गोबर में दबा कर उस पर कामिया सिंदूर छिड़क दें। फिर अपने कार्य की सफलता की प्रार्थना कर प्रस्थान करें, सफलता मिलेगी।
सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए : नवविवाहिता वधू की विदाई के समय एक लोटा गंगाजल में हल्दी और एक पीला सिक्का डालकर वधू के सिर से उतार लें और फिर उसके आगे फेंक दें। यह क्रिया पूरी निष्ठा के साथ करें, वधू का वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा।
बच्चे के दांत निकलने में कष्ट से मुक्ति हेतु : बच्चे को दांत निकलते समय दर्द होता हो, तो उसके गले में रोहू मछली के पांच दांत धागे में बांधकर लटका दें। बच्चे को दर्द से राहत मिलेगी।
परीक्षा में सफलता हेतु : परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
पदोन्नति हेतु : शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
मुकदमे में विजय हेतु : पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
पढ़ाई में एकाग्रता हेतु : शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के २२ पत्ते ले आएं और उनमें से ११ पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष ११ पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
कार्य में सफलता के लिए : अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।
गृह कलह से मुक्ति हेतु : परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा।
क्रोध पर नियंत्रण हेतु : यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें। यदि परिवार में पुरुष सदस्यों के कारण आपस में तनाव रहता हो, तो पूर्णिमा के दिन कदंब वृक्ष की सात अखंड पत्तों वाली डाली लाकर घर में रखें। अगली पूर्णिमा को पुरानी डाली कदंब वृक्ष के पास छोड़ आएं और नई डाली लाकर रखें। यह क्रिया इसी तरह करते रहें, तनाव कम होगा।
मकान खाली कराने हेतु : शनिवार की शाम को भोजपत्र पर लाल चंदन से किरायेदार का नाम लिखकर शहद में डुबो दें। संभव हो, तो यह क्रिया शनिश्चरी अमावस्या को करें। कुछ ही दिनों में किरायेदार घर खाली कर देगा। ध्यान रहे, यह क्रिया करते समय कोई टोके नहीं।
बिक्री बढ़ाने हेतु : ग्यारह गोमती चक्र और तीन लघु नारियलों की यथाविधि पूजा कर उन्हें पीले वस्त्र में बांधकर बुधवार या शुक्रवार को अपने दरवाजे पर लटकाएं तथा हर पूर्णिमा को धूप दीप जलाएं। यह क्रिया निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करें, ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होगी और बिक्री बढ़ेगी।
शुक्रिया
भवदीया
मोहित शाह .


Thursday, 13 September 2012


    
     प्रेम एक पवित्र भाव है। मानव मात्र प्रेम के सहारे जीता है और सदैव प्रेम के लिए लालयित रहता है। प्रेम का अर्थ केवल पति-पत्नी या प्रे‍मी-प्रेमिका के प्रेम से नहीं लिया जाना चाहिए। मनुष्य जिस समाज में रहता है, उसके हर रिश्ते से उसे कितना स्नेह- प्रेम मिलेगा, यह बात कुंडली भली-भाँति बता सकती है
प्रेम एक दिव्य, अलौकिक एवं वंदनीय तथा प्रफुल्लता देने वाली स्थिति है। प्रेम मनुष्य में करुणा, दुलार, स्नेह की अनुभूति देता है। फिर चाहे वह भक्त का भगवान से हो, माता का पुत्र से या प्रेमी का प्रेमिका के लिए हो, सभी का अपना महत्व है। 

ज्योतिष् के अनुसार माना जाता है कि मनुस्य का वर्तमान जीवन, चरित्र और स्वभाव पूर्व जन्मों के अर्जित कर्मो का फल होता है| इसलिए उन्ही स्त्री पुरषों का प्रेम विवाह होगा और सफल होगा जिनके गुण और स्वभाव एक दूसरे से मिलते होंगे|

कैसे होता है प्रेम विवाह? आइए विभिन्न अध्ययनों और जीवन-संसार में देखे गए अनेक अनुभवों के आधार पर बताते हैं कि यह किन ग्रहों के प्रभाव से गृहत्याग करने पर मजबूर करता है और अपना नाम प्रेम विवाह बताता है।
 
                                                                                    

1. लग्नेश का पंचक से संबंध हो और जन्मपत्रिका में पंचमेश-सप्तमेश का किसी भी रूप में संबंध हो। शुक्र, मंगल की युति, शुम्र की राशि में स्थिति और लग्न त्रिकोण का संबंध प्रेम संबंधों का सूचक है। पंचम या सप्तक भाव में शुक्र सप्तमेश या पंचमेश के साथ हो।

2. 
किसी की जन्मपत्रिका में लग्न, पंचम, सप्तम भाव व इनके स्वामियों और शुक्र तथा चन्द्रमा जातक के वैवाहिक जीवन व प्रेम संबंधों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। लग्र या लग्नेश का सप्तम और सप्तमेश का पंचम भाव व पंचमेश से किसी भी रूप में संबंध प्रेम संबंध की सूचना देता है। यह संबंध सफल होगा अथवा नही, इसकी सूचना ग्रह योगों की शुभ-अशुभ स्थिति देती है।

3. 
यदि सप्तकेश लग्नेश से कमजोर हो अथवा यदि सप्तमेश अस्त हो अथवा मित्र राशि में हो या नवांश में नीच राशि हो तो जातक का विवाह अपने से निम्र कुल में होता है। इसके विपरीत लग्नेश से सप्तवेश बाली हो, शुभ नवांश में ही तो जीवनसाथी उच्च कुल का होता है।

4. 
पंचमेश सप्तम भाव में हो अथवा लग्नेश और पंचमेश सप्तम भाव के स्वामी के साथ लग्न में स्थित हो। सप्तमेश पंचम भाव में हो और लग्न से संबंध बना रहा हो। पंचमेश सप्तम में हो और सप्तमेश पंचम में हो। सप्तमेश लग्न में और लग्नेश सप्तम में हो, साथ ही पंचम भाव के स्वामी से दृष्टि संबंध हो तो भी प्रेम संबंध का योग बनता है।

5. 
पंचम में मंगल भी प्रेम विवाह करवाता है। यदि राहु पंचम या सप्तम में हो तो प्रेम विवाह की संभावना होती है। सप्तम भाव में यदि मेष राशि में मंगल हो तो प्रेम विवाह होता है। सप्तमेश और पंचमेश एक-दूसरे के नक्षत्र पर हों तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है।

6. 
पंचमेश तथा सप्तमेश कहीं भी, किसी भी तरह से द्वादशेष से संबंध बनाए लग्नेश या सप्तमेष का आपस में स्थान परिवर्तन अथवा आपस में युक्त होना अथवा दृष्टि संबंध।

7. 
जैमिनी सूत्रानुसार दाराकारक और पुत्रकारक की युति भी प्रेम विवाह कराती है। पंचमेश और दाराकार का संबंध भी प्रेम विवाह करवाता है।

8. 
सप्तमेश स्वग्रही हो, एकादश स्थान पापग्रहों के प्रभाव में बिलकुल न हो, शुक्र लग्न में लग्नेश के साथ, मंगल सप्तक भाव में हो, सप्तमेश के साथ, चन्द्रमा लग्न में लग्नेश के साथ हो, तो भी प्रेम विवाह का योग बनता है।

यदि प्रेम विवाह हो जाता है तो उसकी सफलता पंचमेश, सप्तमेश और लग्नेश, द्वादेश गृह के संबंधों पर निर्भर करती है। प्रेम विवाह के लिए तीसरे भाव का स्वामी का उच्च या बलवान होना बहुत ही आवश्यक है। यही जातक को हिम्मत प्रदान करता है। प्रेम विवाह के लिए जन्मकुण्डली के पहले, पाँचवें सप्तम भाव के साथ-साथ बारहवें भाव को भी देखें क्योंकि विवाह के लिए बारहवाँ भाव भी देखा जाता है। यह भाव शय्या सुख का भी है। इन भावों के साथ-साथ उन (एक, पाँच, सात) भावों के स्वामियों की स्थिति का पता करना होता है। यदि इन भावों के स्वामियों का संबंध किसी भी रूप में अन्य भावों से बन रहा हो तो निश्चित रूप से जातक प्रेम विवाह करता है।

प्रेम विवाह असफल होने के कई कारण


1. शुक्र व मंगल की स्थिति व प्रभाव प्रेम संबंधों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि किसी जातक की कुण्डली में सभी अनुकूल स्थितियाँ होते हुई भी, शुक्र की स्थिति प्रतिकूल हो तो प्रेम संबंध टूटकर दिल टूटने की घटना होती है।

2. सप्तम भाव या सप्तमेश का पाप पीड़ित होना, पापयोग में होना प्रेम विवाह की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। पंचमेश व सप्तमेश दोनों की स्थिति इस प्रकार हो कि उनका सप्तम-पंचम से कोई संबंध न हो तो प्रेम की असफलता दृष्टिगत होती है।

3. शुक्र का सूर्य के नक्षत्र में होना और उस पर चन्द्रमा का प्रभाव होने की स्थिति में प्रेम संबंध होने के उपरांत या परिस्थितिवश विवाह हो जाने पर भी सफलता नहीं मिलती। शुक्र का सूर्य-चन्द्रमा के मध्य में होना असफल प्रेम का कारण है।

4. पंचम व सप्तम भाव के स्वामी ग्रह यदि धीमी गति के ग्रह हों तो प्रेम संबंधों का योग होने या चिरस्थायी प्रेम की अनुभूति को दर्शाता है। इस प्रकार के जातक जीवनभर प्रेम प्रसंगों को नहीं भूलते चाहे वे सफल हों या असफल।

   प्रेम विवाह को मजबूत करने के उपाय :
                                                                      

1. शुक्र देव की पूजा करें।
2. 
पंचमेश व सप्तमेश की पूजा करें।
3. 
पंचमेश का रत्न धारण करें ।
4. 
ब्ल्यू टोपाज सुखद दाम्पत्य एवं वशीकरण हेतु पहनें।
5. 
चन्द्रमणि प्रेम प्रसंग में सफलता प्रदान करती है

Tuesday, 11 September 2012



कुण्डली में ग्रहण योग प्रभाव और उपचार (Grahan Yog in the Kundali)
    


हमारा जीवन चक्र ग्रहों की गति और चाल पर निर्भर करता है. ज्योतिष शास्त्र इन्हीं ग्रहों के माध्य से जीवन की स्थितियों का आंकलन करता है और भविष्य फल बताता है. ज्योतिष गणना में योग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. कुछ योग शुभ स्थिति बताते हैं तो कुछ अशुभता का संकेत देता है.
ग्रहण योग भी अशुभ योग की श्रेणी में आता है. (Grahan yoga is an inauspicious yoga) ग्रहण योग को अशुभ योगों में बहुत ही खतरनाक और कष्टदायक माना गया है. ज्योतिषशास्त्रियों की दृष्टि में यह योग काल सर्प योग से भी खतरनाक और अशुभ फलदायी है (Grahan yog is considered even more harmful than the kalsarp yoga). कालसर्प योग में जीवन में उतार चढ़ाव दोनों आते हैं परंतु यह ऐसा योग है जिसमें सब कुछ बुरा ही होता है. इस योग से प्रभावित व्यक्ति जीवन में हमेशा निराश और हताश रहता है.

ग्रहण योग का प्रभाव (Effects of Grahan Yoga)
जैसे सूर्य को ग्रहण लग जाने पर अंधकार फैल जाता है और चन्द्रमा को ग्रहण लगने पर चांदनी खो जाती है उसी प्रकार जीवन में बनता हुआ हुआ काम अचानक रूक जाता हो तो इसे ग्रहण योग का प्रभाव समझ सकते हैं. हम में से बहुत से लोगों ने महसूस किया होगा कि उनका कोई महत्वपूर्ण काम जब पूरा होने वाला होता है तो बीच में कोई बाधा जाती है और काम बनते बनते रह जाता है. इस स्थिति के आने पर अक्सर हम अपनी किस्मत को कोसते हैं अथवा किसी की नज़र लग गयी है ऐसा सोचते हैं. ज्योतिष शास्त्र की नज़र में यह अशुभ ग्रहण योग का प्रभाव है.

ग्रहण योग निर्माण
ग्रहण योग (Grahan Yoga उस स्थिति में बनता है जबकि कुण्डली के द्वादश भावों में से किसी भाव में सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ राहु केतु में से कोई एक साथ बैठा हो या फिर सूर्य या चन्द्रमा के घर में राहु केतु में से कोई मौजूद हो. अगर इनमें से किसी प्रकार की स्थिति कुण्डली में बन रही है तो इसे ग्रहण योग कहेंगे. ग्रहण योग जिस भाव में लगता है उस भाव से सम्बन्धित विषय में यह अशुभ प्रभाव डालता है. उदाहरण के तौर पर देखें तो द्वितीय भाव धन का स्थान कहलता है. इस भाव में ग्रहण योग लगने से आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. व्यक्ति को धन की हमेंशा कमी महसूस होती है. इनके पास धन आता भी है तो ठहरता नहीं है. इन्हें अगर धन मिलने की संभावना बनती है तो अचानक स्थिति बदल जाती है और धन हाथ आते आते रह जता है.

ग्रहण योग (Grahan Yoga) उपचार  
विज्ञान कहता है जब बीमारी आती है तो उसका ईलाज भी मौजूद होता है बस उसे ढ़ूंढने की आवश्यकता होती है. ज्योतिष शास्त्र में भी यही बात लागू होती है. अगर आप ग्रहण योग से परेशान हैं तो इसका उपचार कराना चाहिए. इस योग के उपचार में एक समस्या यह है कि यह केवल ग्रहण के समय ही किया जा सकता है. इस योग के निवारण हेतु आपको किसी जानकार ज्योतिषाचार्य से सम्पर्क करना चाहिए.

                                                                                          


###There are something such as Grahana dosa in the astrologicalliterature.
The conjunction of either Rahu or Ketu with Sun or Moon is termed as Grahana
dosa. Sun being the king of planets does not fear for any rest of the planets
than the Ketu. 
Grahana dosa offers hurdles and suffererences. The parents suffer, also the
brother and sisters in same ways. At the adult (before crossing the Rahu or
Ketu dasa) the occupation/career/profession won't be stable. The native will be
with Agankara, jealousy, Greedy etc. They won't listen to others. The family
life too they feel not very entertaining at times. 
The conjunction of Sun and Rahu brings trouble in the occupation. We cannot many
with this conjunction in the government jobs. This conjunction at the first
house brings a lot of wealth to the father of the native. At in the thrid house
it brings promotions in the occupation, in the fourth house the native goes
abroad to suffer, but in the fifth house it brings a lot of success at abroad,
in the 9th house it offers higher education, inthe 7th house loss of wealth due
to the involvement with affairs, at the 10th house it brings loss of wealth due
to the involvement in politiics. 

>From the ascendant with in the first six houses if the conjunction of Rahu and

Moon is found the mother's realtives will suffer very much till the age of 12
of the child. ###

Yours sincerely
Mohit shah..